शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन देवी दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की आराधना के लिए समर्पित होता है। मां ब्रह्मचारिणी तपस्या और संयम की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनका स्वरूप दिव्य, ज्योतिर्मय और तेजस्वी है। दाहिने हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल धारण किए हुए वे साधना और संयम का प्रतीक रूप प्रस्तुत करती हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के बाद मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति स्वरूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने हजारों वर्षों तक फल-फूल, शाक और बेलपत्र पर निर्भर रहकर घोर साधना की। उनकी इस कठिन तपस्या ने देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी प्रभावित किया। अंततः ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी कर उन्हें आशीर्वाद दिया कि शिव उन्हें पति रूप में प्राप्त होंगे।
भक्तों के लिए मां ब्रह्मचारिणी की उपासना का विशेष महत्व है। उनकी कृपा से साधकों में संयम, त्याग, सदाचार और वैराग्य जैसे गुण विकसित होते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी भक्त अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता और जीवन में विजय प्राप्त करता है। साथ ही, इच्छाओं से मुक्ति और आत्मिक शांति भी मां की आराधना से मिलती है।
Published: September 23, 2025
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Source: Meta News Channel
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